Tuesday, February 2, 2021

बजट 2021 और मैं







सुबह 6 बजे का अलार्म लगा कर और मॉर्निंग वॉक के न्यू ईयर रेजोल्यूशन की धज्जियाँ उड़ाते हुए मै साढ़े सात बजे उठी। कॉफी पीने के बाद आंख ठीक से खुली। सब काम निपटा कर 10 बजे फोन उठा कर देखा। भिन्न-भिन्न प्रकार की नोटिफिकेशन बता रही थी कि आज बजट पेश होना है। देखते ही आंखे फैल गई। अरे याद कैसे नहीं रहा कि बजट पेश होना है ! फिर अगले ही पल मेरे मन की बात ने कहा रिलैक्स, वर्क फ्रोम होम है! और कौनसा तुम्हें ही बजट पेश करना है! 

खैर, 11 बजे काम करने बैठी। कुछ स्क्रिप्ट फाइनल करनी थीं। लेकिन ध्यान बजट पर ही था। मिलना तो हमें कुछ नहीं था लेकिन बतौर पत्रकार आदत रही है हर ख़बर जानने की और अब तो सोशल मीडिया के दौर में पल पल की खबर की आदत हो गई है। तो लैपटॉप की एक विंडो में स्क्रिप्ट थी, और कई अलग अलग विंडों में न्यूज चैनल और अखबारों की वेबसाइट खुली थीं। साथ ही फोन पर ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब बदल बदल कर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर में बजट के रूझान आने शुरू हो गए थे, कहीं तालियों के साथ तो कहीं गालियों के साथ। रुझान देख कर जोश और बढ़ गया और पूरा फोकस अब बजट की ख़बरों पर ही था। कुल मिलाकर वर्क फ्रोम होम का बैंड बज चुका था! कौनसी स्क्रिप्ट पर काम चल रहा था पता नहीं। ट्विटर और फेसबुक के दौर ने 'सबसे पहले' के नारे को और भी बुलंद किया है। पत्रकार मित्र सोशल मीडिया पर बजट को लेकर अपना अपना मत दे रहे थे। क्या एन्टरटेनमेन्ट बीट वाले और क्या कल्चरल बीट वाले, सोशल मीडिया पर सब इकोनॉमिस्ट हो गए थे। तो एक तरह से मुझ पर भी चौतरफा दबाव बन गया था कि मैं भी जल्द से जल्द बजट को समझूँ और उस पर अपना तड़कता भड़कता मत पेश करूँ। अब मैं भी अमर्त्य सेन बनना चाहती थी। एक बार को मुझे मलाल भी हुआ कि क्यूँ मैंने कभी कॉमर्स या इकनॉमिक्स सब्जेक्ट नहीं पढे। खैर अलग अलग वेबसाइट को पढ़ने के बाद जो समझ में आया वो ये कि बजट हमेशा की तरह मिला जुला ही है यानी कुछ अच्छा और कुछ खराब। हेल्थ के लिए बजट बढ़ाया गया है जैसी उम्मीद थी लेकिन शिक्षा का बजट कम कर दिया गया है जिसे देखकर निराशा हुई। कुछ सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने का ऐलान किया गया है। एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सेस लगाया गया है। लिटरेचर का स्टूडेंट होने के अपने नुकसान होते हैँ। इकोनॉमी से जुड़े भारी भरकम शब्द ज्यादा समझ नहीं आते। फिर भी मैं बजट को पूरा आत्मसात कर लेना चाहती थी, वो भी जल्द से जल्द। दो घंटे बजट को समझने की अधूरी सी कोशिश के बाद मुझे स्क्रिप्ट की याद आयी और मैंने जल्दी से उस पर काम शुरू कर दिया। लेकिन दिमाग के बैकग्राउंड में लाल साड़ी में निर्मला ताई चल रही थीं। खैर किसी तरह स्क्रिप्ट पूरी हुई। 

कुछ समय बाद सोशल मीडिया देखा तो प्रतिक्रियाओं के अनुसार सब कुछ लुट चुका था, देश बिक गया था। बूढ़े, जिन्हे 75 वर्ष की आयु के बाद ITR से छूट दे दी गई थी, वो 75 वर्ष से पहले ही मर सकते थे! मैं अपने कॉमर्स के अल्पज्ञान पर आत्मग्लानि से भर गयी और दोबारा बजट को समझने की कवायद में सोशल मीडिया के ज्ञानी बन्धुओं के लेख पढ़ने लगी। फिर याद आया कि मैंने सुपरफास्ट न्यूज चैनल तो अभी तक देखे ही नहीं फिर बजट क्या मुझे खाक समझ आएगा! इसके बाद मैंने एक एक कर सभी न्यूज चैनल्स को देखना शुरू किया। कुछ चैनल बजट की शान में कसीदे पढ़ रहे थे और कुछ उसे कोस रहे थे। 

लगभग दस न्यूज चैनल देख कर और सुबह से इकनॉमिक्स के ओवरडोज के बाद अब दिमाग बंद हो चला था। चैनल बदलते बदलते कार्टून चैनल लग गया और मैंने दिमाग की शांति के लिए वही देखना उचित समझा। लेकिन पूरा दिन खबर देखने का भी नुकसान होता है। हर चीज़ में खबर ही दिखती है। थोड़ी देर तक Mr. Bean को देखने के बाद बजट के दौरान राहुल गांधी के भाव याद आने लगे। फिर छोटा भीम लगा दिया। जग्गू बंदर पेड़ पर चढ़ा तो न्यूज में देखा हुआ 26 जनवरी को पोल पर चढ़ा एक व्यक्ति याद आ गया। चैनल बदला तो Boonie Bears आ रहा था। थोड़ी देर उसे देख कर हंसने के बाद याद आया कि ये तो चीनी कार्टून है। याद आते ही मेरा खून खौल गया। देशभक्ति उबाल मारने लगी। इसके बाद मैंने ठान लिया कि जैसे हमारी सरकार ने चाइनीज Apps ban कर के चीन को मुँहतोड़ जवाब दिया है वैसे ही मैं भी Boonie Bears ना देख कर और चैनल बदल कर चीन को मुँहतोड़ जवाब दूँगी! 

चैनल बदल कर मैं फिर से न्यूज चैनल पर पहुंच गयी। एक बिजनेस चैनल को निर्मला ताई इंटरव्यू दे रही थीं। सुपर एक्सक्लूसिव इंटरव्यू! मैंने वही देखना शुरू किया ताकि जो कुछ समझ नहीं आया वो सीधे उन्हीं से पता चल जाएगा, यू नो स्ट्रेट फ्रोम द हॉर्सिस माउथ! 10 मिनट का इंटरव्यू देखने के बाद पता चला कि हेल्थ, इन्फ्रास्ट्रक्चर और बहुत कुछ और का बजट बढ़ाने के बाद ताई जी के पास चार आने भी नहीं बचे थे इसलिए वो इस बार भी मिडल क्लास वालों को कुछ नहीं दे पायीं। खैर ये तो हमें पहले ही पता था लेकिन बजट तो समझना ही था। मैने सोचा कि हम तो पहले भी खाली हाथ थे और अब भी खाली हाथ हैं। इसके साथ ही मेरे दिमाग में रितिक रोशन की पहली फिल्म का गाना चलने लगा - खाली हाथ आए थे हम, खाली हाथ जाएँगे.. तो मैंने अपने इसी अल्पज्ञान को #middleclass और #Budget2021 लगा कर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। कुछ लोगों को पसंद आया तो मुझे लगा शायद बजट पर मेरा ज्ञान इतना भी अल्प नहीं है, आखिर आज-कल लोग इसी तरह का ज्ञान पसंद करते हैं ! 

निर्मला ताई के सुपर एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के बीच हमारे घर की डोर बेल बजी। बाहर देखा तो कुछ लोग खड़े थे। पूछने पर पता चला मंदिर के लिए चंदा लेने आए हैं। पहले सोचा कल आइए कह कर टाल दूँ क्यूंकि मैं सुपर एक्सक्लूसिव इंटरव्यू मिस नहीं करना चाहती थी। फिर सोचा जल्दी से चंदा दे कर निपटा दूँ। मैं हाथ में पर्स लिए दरवाजे की तरफ दौड़ी, जिसे उन्होंने मेरा चंदा देने के लिए उतावलापन समझा होगा। मैंने पर्स में से निकाल कर कुछ रुपये आगे बढ़ा दिए। उन्होंने मेरे उतावलेपन से नोटों को मैच करते हुए मेरी ओर देखा औऱ फिर पर्स की ओर। मैंने मौके की नजाकत भांप कर पर्स में रखे कुछ और नोट भी आगे बढ़ा दिए। बदले में उन्होंने मुझे पर्चियों का एक बंडल थमा दिया। मैंने दरवाजा बंद किया और अपने खाली पर्स की ओर देखा। सामने टीवी पर निर्मला ताई बता रही थीं कि लोगों को बजट से कितना फायदा होगा। लेकिन अब उनकी बातों में मेरी कोई रुचि नहीं थी। मेरा बटुआ खाली था और सरकार का भी! 

--प्रियंका सिंह 

बजट 2021 और मैं

सुबह 6 बजे का अलार्म लगा कर और मॉर्निंग वॉक के न्यू ईयर रेजोल्यूशन की धज्जियाँ उड़ाते हुए मै साढ़े सात बजे उठी। कॉफी पीने के बाद आंख ठीक से ...